Thursday, July 3, 2025

ये शहर दिल्ली

इतनी बार आने के बाद भी

भागते रहते हैं

सोचते हैं, रुक जायें

लेकिन ठहरते नहीं।


कभी बस अड्डे से आया था,

रिज की पहाड़ियों को पार करके,

क्लास के बाद मुकुल सराय में घंटों टाइमपास किया था,

और किसी शाम शंकतुलम में फिल्म देखी थी

जहाँ अब कुछ बना भी है और नहीं भी 

लेकिन आंखें अब भी उसी स्क्रीन को ढूंढती हैं।


यहीं पहली मोहब्बत मिली,

पहली हार, पहली रैली,

किसी मार्च में नारे लगाते हुए

जैसे पहली बार अपनी आवाज़ सुनी थी।


दिल्ली में पहली बार किराया चुकाया,

पहली बार तन्हाई भी सीखी,

अपना घर, अपनी कार —

जैसे इस शहर ने धीरे-धीरे मुझे अपनाया हो।


इधर कुछ सालों से पेरिस में हूँ,

सड़कों के नाम अब याद हो चले हैं,

कैफे वाले मुस्कराने लगे हैं,

गली के नुक्कड़ वाला पार्क भी

थोड़ा अपना सा लगने लगा है।


फिर भी…

दिल्ली की तरह कोई शहर नहीं चुभता,

कोई शहर उतना अपना भी नहीं लगता।

जहाँ हर मोड़ पर कोई कहानी हो,

हर कोना एक दस्तावेज़ हो,

और हर शाम एक किस्सा।


दिल्ली —

किसी की नहीं, सबकी है,

जैसे कोई किराएदार शहर

जो सबको थोड़ा सा दे देता है,

लेकिन पूरा कभी किसी का नहीं होता।


फिर भी जब याद आता है,

दिल्ली का नाम

तो कुछ भीतर धड़कता है —

एक पुरानी सी गली,

किसी दोस्त की हँसी,

या वो बस जो हमसे छूट गई थी।


जुलाई २, २०२५, पेरिस की एक शाम 





Wednesday, June 9, 2010

संघर्ष ही जीवन है


सपनो की ऊँगली पकडे
एक नदी की धार के पीछे
संघर्ष ही जीवन है का नारा लगाते
आखिर एक समुन्दर में मिल गए तुम
एक लम्बी यात्रा को
मेरी शुभकामनायें मेरे दोस्त !
- आशीष मंडलोई हमारा नर्मदा बचाओ आन्दोलन का साथी जो २० मई को शांत हो गया (जैसे की निमाड़ में लोग बोलते हैं) .

Wednesday, June 2, 2010

ख़ुदा के नेक बंदे

पत्थर की मूर्तियों में है बसता ख़ुदा
मानकर तोड़ डाला
तुमने
बेज़ान मुस्कुराते बुद्ध को
अपने पागलपन को छुपाने की
ख़ातिर
एक शातिप्रिय पागल को मिटाया है
तुमने
एक सूर्य को बुझाने की कोशिश में
अपना घर ख़ुद जलाया है
तुमने
ख़ुदा के नाम पर ही
ख़ुदा के बन्दों को सताया है
तुमने
कब तक यूँ ही तुम्हारा पागलपन
रहेगा जारी
कब तक यूँ ही दुनिया
रहेगी खामोश
ऐ ख़ुदा के नेक बंदे
कभी तो तुम्हे अक्ल आएगी
और पत्थरों को छोड़
अपने पागलपन के अनेक
चेहरों को तोड़ोगे तुम  .
- मधुरेश, मार्च २५ २००१. तालिबान के द्वारा बामियान में बुद्ध की प्रतिमा तोड़ने के बाद.

मैं देशद्रोही हूँ (?)

जलियांवाला बाग़ हत्याकांड के विरोध में डंडे खाए हैं मैंने
चौरी चौरा में जेल गया हूँ
भारत छोड़ो आन्दोलन में घर छोड़ निकल पड़ा
देश की आज़ादी की खातिर
लोगों ने कहा क्रांतिकारी
अंग्रेज़ी हुकूमत ने कहा देशद्रोही, राजद्रोही
तो क्या मैं देशद्रोही हूँ ?

सोचा था आज़ाद भारत में मैं देशभक्त हूँ
पर गलत था मैं
पुरानी दिल्ली की गलियों में
अपनी जान बचाने को कुत्तों की तरह भागा हूँ मैं
क्योंकि मैं नहीं मानता
हिंदुस्तान सिर्फ हिन्दुओं का है
तो क्या मैं देशद्रोही हूँ ?

गर्व से कहो हम हिन्दू हैं का नारा
और बाबरी मस्जिद तोड़ डाला
एक बार फिर से भाग रहा था
मैं बम्बई की सड़को पर
अपनी जान बचाने की खातिर
आखिर क्यूं, आखिर क्यूं ?
- मधुरेश, जनुअरी 2001

रिश्ते

रिश्तों को एक नाम देने
की कोशिश में
हर पल उलझता रहा हूँ मैं
क्या रिश्ते बेनाम नहीं होते ?
हर रिश्ते का नाम जरूरी है
माँ, बाप, भाई, बहन के रिश्तों
से भाग तो नहीं सकता कोई
पर रिश्ते बदलते तो हैं
ज़िन्दगी बीत गयी
रिश्तों की उलझन सुलझाने में
क्या रिश्ता है ?
ज़िन्दगी का मौत से
फूलों का भौरों से
प्यासे का पानी से
और मधुमखी का शहद से
सिर्फ ये की सब कुछ सच है
कुछ भी झूठ नहीं
रिश्तों के बंधन से भाग सका है कोई
सिर्फ समझौते किये हैं
और रिश्तों के नाम बदलते रहे हैं
बदलते रहे हैं .
- मधुरेश, दिसम्बर २०००

ज़िन्दगी की लम्बी दौड़ में

ज़िन्दगी की लम्बी दौड़ में
दो बूँद ख़ुशी के लिए तरसता रहा
राशन की लाइन में खड़ा रह गया
दो किलो गेहूं के लिए
हर कोई चला गया पर
मेरी बारी नहीं आई

तिनके तिनके की ख़वाहिश लिए
दर दर ठोकरे खाता रहा
रात और दिन बीतते रहे
किसी ने याद तक नहीं किया

एक मैं
जिसने हर किसी को याद किया
बार्रिश में भीगते
खुले आँखों सपना देखते
शायद कोई आ जाये
घडी की टिक टिक के पीछे
भागता रहा मैं

समय को पकड़ने की कोशिश में
सोचा साथ चलने का मौका तो मिलेगा
पर वक़्त हाथों से फिसलता रहा
और मेरी रूह बेचैन
किसी के तलाश में भटकती रही

- मधुरेश, दिसम्बर 2000

मैं एक कुत्ता हूँ

मैं एक कुत्ता हूँ
ईमानदारी की रोटी खाने का दंभ भरता हूँ
बड़ी बड़ी बातें करता हूँ
पर एक बिल्ली की म्याऊँ से
डर जाता हूँ

सुबह सुबह ब्लू लाइन बस में
दो लोग की ज़ेब काटकर मंदिर में प्रसाद चढ़ाता हूँ
मैं एक कुत्ता हूँ

दोपहर की चिलचिलाती धूप में
स्वभिमान से भरा खली पेट लिए
ढाबों का बोर्ड पढता हुआ
गुरूद्वारे के लंगर से
अपनी भूख मिटाता हूँ
मैं एक कुत्ता हूँ
- मधुरेश, नवम्बर, 2000